मन में अभिमानमय उल्लास का आनंद उठाता हुआ, बड़े सम्मान से पंडितजी को आँगन में ले गया। महाराज ने गऊ को अपने पुरानी अनुभवी आँखों से देखा, सींगें देखीं, थन देखा, पुट्टा देखा और घनी सफेद भौंहों के नीचे छिपी हुई आँखों में जवानी की उमंग भर कर बोले - कोई दोष नहीं है बेटा, बाल-भौंरी, सब ठीक। भगवान चाहेंगे, तो तुम्हारे भाग खुल जाएँगे, ऐसे अच्छे लच्छन हैं कि वाह! बस रातिब न कम होने पाए। एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा।
होरी ने आनंद के सागर में डुबकियाँ खाते हुए कहा - सब आपका असीरबाद है, दादा!
दातादीन ने सुरती की पीक थूकते हुए कहा - मेरा असीरबाद नहीं है बेटा, भगवान की दया है। यह सब प्रभु की दया है। रुपए नगद दिए?
होरी ने बे-पर की उड़ाई। अपने महाजन के सामने भी अपने समृद्धि-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पा कर वह कैसे छोड़े। टके की नई
गोबर और होरी के खाँचे उतरवाए और झुनिया से बोले - पहले एक चिलम भर ला, फिर थोड़ा-सा रस बना ले। पानी न हो तो गगरा ला, मैं खींच दूँ। होरी महतो को पहचानती है न?
फिर होरी से बोला - घरनी के बिना घर नहीं रहता भैया। पुरानी कहावत है - 'नाटन खेती बहुरियन घर'। नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएँ क्या घर सँभालेंगी। जब से इनकी माँ मरी है, जैसे घर की बरक्कत ही उठ गई। बहुएँ आटा पाथ लेती हैं; पर गृहस्थी चलाना क्या जानें। हाँ, मुँह चलाना खूब