मर्म-भरी आँखों से देख कर उसकी सतर्कता को स्वीकार किया, मानो कह रहे हों, गृहिणी का यही धर्म है, सीटना मरदों का काम है, उन्हें सीटने दो।' फिर रहस्य-भरे स्वर में बोले - बाहर न बाँधना, इतना कहे देते हैं।
धनिया ने पति की ओर विजयी आँखों से देखा, मानो कह रही हो। लो, अब तो मानोगे।
दातादीन से बोली - नहीं महाराज, बाहर क्या बाँधेगे, भगवान दें तो इसी आँगन में तीन गाएँ और बँधा सकती हैं।
सारा गाँव गाय देखने आया। नहीं आए तो सोभा और हीरा, जो अपने सगे भाई थे। होरी के हृदय में भाइयों के लिए अब भी कोमल स्थान था। वह दोनों आ कर देख लेते और प्रसन्न हो जाते तो उसकी मनोकामना पूरी हो जाती। साँझ हो गई। दोनों पुर ले कर लौट आए। इसी द्वार से निकले, पर पूछा कुछ नहीं।
होरी ने डरते-डरते धनिया से कहा - न सोभा आया, न हीरा। सुना न होगा?
झुनिया ने कलसा न दिया। कुएँ के जगत पर जा कर मुस्कराती हुई बोली - तुम हमारे मेहमान हो। कहोगे, एक लोटा पानी भी किसी ने न दिया।
'मेहमान काहे से हो गया। तुम्हारा पड़ोसी ही तो हूँ।'
'पड़ोसी साल-भर में एक बार भी सूरत न दिखाए, तो मेहमान ही है।'
'रोज-रोज आने से मरजाद भी तो नहीं रहती।
झुनिया हँस कर तिरछी नजरों से देखती हुई बोली - वही मरजाद तो दे रही हूँ। महीने में एक बार आओगे, ठंडा पानी दूँगी। पंद्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे।