पाँवों में मेंहदी लगी हुई थी, मगर आएँ कैसे ? जलन हो रही होगी कि इसके घर गाय आ गई। छाती फटी जाती होगी।
दिया-बत्ती का समय आ गया था। धनिया ने जा कर देखा, तो बोतल में मिट्टी का तेल न था। बोतल उठा कर तेल लाने चली गई। पैसे होते तो रूपा को भेजती, उधार लाना था, कुछ मुँह देखी कहेगी, कुछ लल्लो-चप्पो करेगी, तभी तो तेल उधार मिलेगा।
होरी ने रूपा को बुला कर प्यार से गोद में बैठाया और कहा - जरा जा कर देख, हीरा काका आ गए कि नहीं। सोभा काका को भी देखती आना। कहना, दादा ने तुम्हें बुलाया है। न आएँ, हाथ पकड़ कर खींच लाना।
रूपा ठुनक कर बोली - छोटी काकी मुझे डाँटती है।
'काकी के पास क्या करने जायगी! फिर सोभा-बहू तो तुझे प्यार करती है?'
'सोभा काका मुझे चिढ़ाते हैं? मैं न कहूँगी।'
'क्या कहते हैं, बता?'
'चिढ़ाते हैं।'
'क्या कह कर चिढ़ाते हैं?'
गोबर ने कलसा भर कर निकाला। सबों ने रस पिया और एक चिलम तमाखू और पी कर लौटे। भोला ने कहा - कल तुम आ कर गाय ले जाना गोबर, इस बखत तो सानी खा रही है।
गोबर की आँखें उसी गाय पर लगी हुई थीं और मन-ही-मन वह मुग्ध हुआ जाता था। गाय इतनी सुंदर और सुडौल है, इसकी उसने कल्पना भी न की थी।
होरी ने लोभ को रोक कर कहा - मँगवा लूँगा, जल्दी क्या है?
'तुम्हें जल्दी न हो, हमें तो जल्दी है। उसे द्वार पर देख कर तुम्हें वह बात याद रहेगी।'