'हीरा कहता होगा?'
'सारा गाँव कह रहा है। हीरा को क्यों बदनाम करूँ।'
'सारा गाँव नहीं कह रहा है, अकेला हीरा कह रहा है। मैं अभी जा कर पूछती हूँ न कि तुम्हारे बाप कितने रुपए छोड़ कर मरे थे? डाढ़ीजारों के पीछे हम बरबाद हो गए। सारी जिंदगी मिट्टी में मिला दी, पाल-पोस कर संडा किया, और अब हम बेईमान हैं। मैं कह देती हूँ, अगर गाय घर के बाहर निकली, तो अनर्थ हो जायगा। रख लिए हमने रुपए, दबा लिए, बीच खेत दबा लिए। डंके की चोट कहती हूँ, मैंने हंडे भर असर्फियाँ छिपा लीं। हीरा और सोभा और संसार को जो करना हो, कर ले। क्यों न रुपए रख लें? दो-दो संडों का ब्याह नहीं किया, गौना नहीं किया?'
होरी सिटपिटा गया। धनिया ने उसके हाथ से पगहिया छीन ली, और गाय को खूँटे से बाँध कर द्वार की ओर चली। होरी ने उसे पकड़ना चाहा, पर वह बाहर जा
मैं अँधरे ही चला जाऊँगा। जा कर नाँद तो गाड़ दूँ, लेकिन नहीं, जब तक गाय द्वार पर न आ जाय, नाँद गाड़ना ठीक नहीं। कहीं भोला बदल गए या और किसी कारण से गाय न दी, तो सारा गाँव तालियाँ पीटने लगेगा, चले थे गाय लेने! पट्ठे ने इतनी फुर्ती से नाँद गाड़ दी, मानो इसी की कसर थी। भोला है तो अपने घर का मालिक, लेकिन जब लड़के सयाने हो गए, तो बाप की कौन चलती है? कामता और जंगी अकड़ जायँ तो क्या भोला अपने मन से गाय मुझे दे देंगे? कभी नहीं।
सहसा