को भी क्रियाशील बना डाला। आग को फूँक-फूँक कर उसमें ज्वाला पैदा कर दी। हीरा पराजित-सा पीछे हट गया। पुन्नी उसका हाथ पकड़ कर घर की ओर खींच रही थी। सहसा धनिया ने सिंहनी की भाँति झपट कर हीरा को इतने जोर से धक्का दिया कि वह धम से गिर पड़ा और बोली - कहाँ जाता है, जूते मार, मार जूते, देखूँ तेरी मरदुमी!
होरी ने दौड़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और घसीटता हुआ घर ले चला।
भाग 5
उधर गोबर खाना खा कर अहिराने में जा पहुँचा। आज झुनिया से उसकी बहुत-सी बातें हुई थीं। जब वह गाय ले कर चला था, तो झुनिया आधे रास्ते तक उसके साथ आई थी। गोबर अकेला गाय को कैसे ले जाता! अपरिचित व्यक्ति के साथ जाने में उसे आपत्ति होना स्वाभाविक था। कुछ दूर चलने के बाद झुनिया ने गोबर को मर्म-भरी आँखों से देख कर कहा - अब तुम काहे को यहाँ कभी आओगे?
एक
चौधरी ने होरी का आसन पा कर चाबुक जमाया - हमारा तुम्हारा पुराना भाई-चारा है, महतो, ऐसी बात है भला, लेकिन बात यह है कि ईमान आदमी बेचता है, तो किसी लालच से। बीस रुपए नहीं, मैं पंद्रह रुपए कहूँगा, लेकिन जो बीस रुपए के दाम लो।
होरी ने खिसिया कर कहा - तुम तो चौधरी अंधेर करते हो, बीस रुपए में कहीं ऐसे बाँस जाते हैं?
'ऐसे क्या, इससे अच्छे बाँस जाते हैं दस रुपए पर, हाँ, दस कोस और पच्छिम चले जाओ। मोल बाँस का नहीं है, सहर के नगीच