जब देखूँ, दो-चार लौंडे उनको घेरे हुए हैं। जो सबसे बड़ी थी, वह तो कोट-पतलून पहन कर घोड़े पर सवार हो कर मरदों के साथ सैर करने जाती थी। सारे सहर में उनकी लीला मशहूर थी। गपड़ू बाबू सिर नीचा किए, जैसे मुँह में कालिख-सी लगाए रहते थे। लड़कियों को डाँटते थे, समझाते थे, पर सब-की-सब खुल्लमखुल्ला कहती थीं - तुमको हमारे बीच में बोलने का कुछ मजाल नहीं है। हम अपने मन की रानी हैं, जो हमारी इच्छा होगी,वह हम करेंगे। बेचारा बाप जवान-जवान लड़कियों से क्या बोले? मारने-बाँधने से रहा, डाँटने-डपटने से रहा, लेकिन भाई, बड़े आदमियों की बातें कौन चलावे। वह जो कुछ करें, सब ठीक है। उन्हें तो बिरादरी और पंचायत का भी डर नहीं। मेरी समझ में तो यही नहीं आता कि किसी का रोज-रोज मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया-बीता हो गया? लेकिन
होरी ने कहा - अब फिर मार-धाड़ न करना। इससे औरत बेसरम हो जाती है।
धनिया ने द्वार पर आ कर हाँक लगाई - तुम वहाँ खड़े-खड़े क्या तमासा देख रहे हो? कोई तुम्हारी सुनता भी है कि यों ही सिच्छा दे रहे हो। उस दिन इसी बहू ने तुम्हें घूँघट की आड़ में डाढ़ीजार कहा था, भूल गए। बहुरिया हो कर पराए मरदों से लड़ेगी, तो डाँटी न जायगी।
होरी द्वार पर आ कर नटखटपन के साथ बोला - और जो मैं इसी तरह तुझे मारूँ?
'क्या कभी मारा नहीं है, जो मारने की साध बनी हुई है।'