ने हथौड़े की दूसरी चोट जमाई - मानता हूँ, आपका अपने असामियों के साथ बहुत अच्छा बर्ताव है, मगर प्रश्न यह है कि उसमें स्वार्थ है या नहीं। इसका एक कारण क्या यह नहीं हो सकता कि मद्धिम आँच में भोजन स्वादिष्ट पकता है? गुड़ से मारने वाला जहर से मारने वाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है। मैं तो केवल इतना जानता हूँ, हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं। हैं तो उसका व्यवहार करें, नहीं हैं, तो बकना छोड़ दें। मैं नकली जिंदगी का विरोधी हूँ। अगर माँस खाना अच्छा समझते हो तो खुल कर खाओ। बुरा समझते हो, तो मत खाओ, यह तो मेरी समझ में आता है, लेकिन अच्छा समझना और छिप कर खाना, यह मेरी समझ में नहीं आता। मैं तो इसे कायरता भी कहता हूँ और धूर्तता भी, जो वास्तव में एक हैं।
रायसाहब सभा-चतुर आदमी थे। अपमान और आघात को धैर्य और उदारता से सहने का उन्हें
होरी ने घुन्ना कर कहा - मुझे भूख नहीं है।
धनिया ने जले पर नोन छिड़का - हाँ, काहे को भूख लगेगी! भाई ने बडे-बड़े लड्डू खिला दिए हैं न। भगवान ऐसे सपूत भाई सबको दें।
होरी बिगड़ा। और क्रोध अब रस्सियाँ तुड़ा रहा था? तू आज मार खाने पर लगी हुई है!
धनिया ने नकली विनय का नाटक करके कहा - क्या करूँ, तुम दुलार ही इतना करते हो कि मेरा सिर फिर गया है।
'तू घर में रहने देगी कि नहीं?'
'घर तुम्हारा, मालिक तुम, मैं भला कौन होती हूँ तुम्हें घर से निकालने वाली?'