विश्वास हो गया कि एक बड़े भारी मुस्लिम ताल्लुकेदार को नीचा दिखा कर कौंसिल में पहुँच गए।
अपने जगह पर बैठे-बैठे बोले - जी नहीं, मैं किसी का दीन नहीं बिगाड़ता। यह काम आपको खुद करना चाहिए। मजा तो जब है कि आप उन्हें शराब पिला कर छोड़ें। यह आपके हुस्न के जादू की आजमाइश है।
चारों तरफ से आवाजें आईं - हाँ-हाँ, मिस मालती, आज अपना कमाल दिखाइए। मालती ने मिर्जा को ललकारा - कुछ इनाम दोगे?
'सौ रुपए की एक थैली।'
'हुश! सौ रुपए! लाख रुपए का धर्म बिगाडूँ सौ के लिए।'
'अच्छा, आप खुद अपनी फीस बताइए।'
'एक हजार, कौड़ी कम नहीं।'
'अच्छा, मंजूर।'
'जी नहीं, ला कर मेहता जी के हाथ में रख दीजिए।'
मिर्जा जी ने तुरंत सौ रुपए का नोट जेब से निकाला और उसे दिखाते हुए खड़े हो कर बोले- भाइयो! यह हम सब मरदों की इज्जत
'काकी के पास क्या करने जायगी! फिर सोभा-बहू तो तुझे प्यार करती है?'
'सोभा काका मुझे चिढ़ाते हैं? मैं न कहूँगी।'
'क्या कहते हैं, बता?'
'चिढ़ाते हैं।'
'क्या कह कर चिढ़ाते हैं?'
'कहते हैं, तेरे लिए मूस पकड़ रखा है। ले जा, भून कर खा ले।'
होरी के अंतस्तल में गुदगुदी हुई।
'तू कहती नहीं, पहले तुम खा लो, तो मैं खाऊँगी।'
'अम्माँ मने करती हैं। कहती हैं, उन लोगों के घर न जाया करो।'
'तू अम्माँ की बेटी है कि दादा की?'
रूपा ने उसके गले में हाथ डाल कर कहा - अम्माँ की और हँसने लगी।