मालती ने ठोकर मारी - देखिए मिर्जा जी, तबेले में लतिआहुज अच्छी नहीं।
मिर्जा ने दुम हिलाई - कान पकड़ता हूँ देवी जी!
मिस्टर तंखा की तलाशी हुई। मुश्किल से दस रुपए निकले, मेहता की जेब से केवल अठन्नी निकली। कई सज्जनों ने एक-एक, दो-दो रुपए खुद दिए। हिसाब जोड़ा गया, तो तीन सौ की कमी थी। यह कमी रायसाहब ने उदारता के साथ पूरी कर दी।
संपादक जी ने मेवे और फल खाए थे और जरा कमर सीधी कर रहे थे कि रायसाहब ने जा कर कहा - आपको मिस मालती याद कर रही हैं।
खुश हो कर बोले - मिस मालती मुझे याद कर रही हैं, धन्य-भाग! रायसाहब के साथ ही हाल में आ विराजे।
उधर नौकरों ने मेजें साफ कर दी थीं। मालती ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया।
संपादक जी ने नम्रता दिखाई - बैठिए, तकल्लुफ न कीजिए। मैं इतना बड़ा आदमी नहीं हूँ।
मालती
तो फिर भाइयों की याद आई। नहीं, आज इस शुभ अवसर पर वह भाइयों की उपेक्षा नहीं कर सकता। उसका हृदय यह विभूति पा कर विशाल हो गया था। भाइयों से अलग हो गया है, तो क्या हुआ। उनका दुश्मन तो नहीं है। यही गाय तीन साल पहले आई होती, तो सभी का उस पर बराबर अधिकार होता। और कल को यही गाय दूध देने लगेगी, तो क्या वह भाइयों के घर दूध न भेजेगा या दही न भेजेगा? ऐसा तो उसका धरम नहीं है। भाई उसका बुरा चेतें, वह क्यों उनका बुरा चेते? अपनी-अपनी करनी तो अपने-अपने साथ है।