रायसाहब ने गर्म हो कर कहा - अगर इसने देवी जी को हाथ लगाया, तो चाहे मेरी लाश यहीं तड़पने लगे, मैं उससे भिड़ जाऊँगा। आखिर वह भी आदमी ही तो है।
मिर्जा साहब ने संदेह से सिर हिला कर कहा - रायसाहब, आप अभी तो इन सबों के मिजाज से वाकिफ नहीं हैं। यह फैर करना शुरू करेगा, तो फिर किसी को जिंदा न छोड़ेगा। इनका निशाना बेखता होता है।
मि. तंखा बेचारे आने वाले चुनाव की समस्या सुलझाने आए थे। दस-पाँच हजार का वारा-न्यारा करके घर जाने का स्वप्न देख रहे थे। यहाँ जीवन ही संकट में पड़ गया। बोले - सबसे सरल उपाय वही है, जो अभी खन्ना जी ने बतलाया। एक हजार की ही बात और रुपए मौजूद हैं, तो आप लोग क्यों इतना सोच-विचार कर रहे हैं।
मिस मालती ने तंखा को तिरस्कार-भरी आँखों से देखा!
'आप लोग इतने कायर हैं, यह मैं न समझती थी।'
झुनिया और गहरे पानी में उतरी - भिक्षुक जब तक दस द्वारे न जाय, उसका पेट कैसे भरेगा? मैं ऐसे भिक्षुकों को मुँह नहीं लगाती। ऐसे तो गली-गली मिलते हैं। फिर भिक्षुक देता क्या है, असीस! असीसों से तो किसी का पेट नहीं भरता।
मंद-बुद्धि गोबर झुनिया का आशय न समझ सका। झुनिया छोटी-सी थी, तभी से ग्राहकों के घर दूध ले कर जाया करती थी। ससुराल में उसे ग्राहकों के घर दूध पहुँचाना पड़ता था। आजकल भी दही बेचने का भार उसी पर था। उसे तरह-तरह के मनुष्यों