उसके बर्बर प्रेम का आनंद उठाने के लिए ललचा रहा था। शिष्ट प्रेम की दुर्बलता और निर्जीवता का उन्हें अनुभव हो चुका था। आज अक्खड़, अनगढ़ पठानों के उन्मत्त प्रेम के लिए उनका मन दौड़ रहा था, जैसे संगीत का आनंद उठाने के बाद कोई मस्त हाथियों की लड़ाई देखने के लिए दौड़े।
उन्होंने खान साहब के सामने जा कर निश्शंक भाव से कहा - तुम्हें रुपए नहीं मिलेंगे।
खान ने हाथ बढ़ा कर कहा- तो अम तुमको लूट ले जायगा।
'तुम इतने आदमियों के बीच से हमें नहीं ले जा सकते।'
'अम तुमको एक हजार आदमियों के बीच से ले जा सकता है।'
'तुमको जान से हाथ धोना पड़ेगा।'
'अम अपने माशूक के लिए अपने जिस्म का एक-एक बोटी नुचवा सकता है।'
उसने मालती का हाथ पकड़ कर खींचा। उसी वक्त होरी ने कमरे में कदम रखा। वह राजा जनक का माली बना हुआ था और उसके अभिनय
गोबर उसे चकित नेत्रों से देखने लगा।
झुनिया ने फिर कहा - और जानते हो, दाम क्या देना होगा? मेरा हो कर रहना पड़ेगा। फिर किसी के सामने हाथ फैलाए देखूँगी, तो घर से निकाल दूँगी।
गोबर को जैसे अँधेरे में टटोलते हुए इच्छित वस्तु मिल गई। एक विचित्र भयमिश्रित आनंद से उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा। लेकिन यह कैसे होगा? झुनिया को रख ले, तो रखेली को ले कर घर में रहेगा कैसे। बिरादरी का झंझट जो है। सारा गाँव काँव-काँव करने लगेगा। सभी दुसमन हो जाएँगे।