करनी थीं। खुर्शेद और तंखा बच रहे। उनकी टोली बनी-बनाई थी। तीनों टोलियाँ एक-एक तरफ चल दीं।
कुछ दूर तक पथरीली पगडंडी पर मेहता के साथ चलने के बाद मालती ने कहा - तुम तो चले ही जाते हो। जरा दम ले लेने दो।
मेहता मुस्कराए - अभी तो हम एक मील भी नहीं आए। अभी से थक गईं?
'थकी नहीं, लेकिन क्यों न जरा दम ले लो।'
'जब तक कोई शिकार हाथ न आ जाय, हमें आराम करने का अधिकार नहीं।'
'मैं शिकार खेलने न आई थी।'
मेहता ने अनजान बन कर कहा - अच्छा, यह मैं न जानता था। फिर क्या करने आई थीं?
'अब तुमसे क्या बताऊँ।'
हिरनों का एक झुंड चरता हुआ नजर आया। दोनों एक चट्टान की आड़ में छिप गए और निशाना बाँध कर गोली चलाई। निशाना खाली गया। झुंड भाग निकला। मालती ने पूछा - अब?
'कुछ नहीं, चलो फिर कोई शिकार मिलेगा।'
को अपने घर में बंद करके बेइज्जत करो। इसीलिए तिलक-मुद्रा का जाल बिछाए बैठे हो? लगा हाथ जोड़ने, पैरों पड़ने, एक प्रेमी का मन रख दोगी, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जायगा झूना रानी! कभी-कभी गरीबों पर दया किया करो, नहीं भगवान पूछेंगे, मैंने तुम्हें इतना रूप-धन दिया था, तुमने उससे एक ब्राह्मण का उपकार भी नहीं किया, तो क्या जवाब दोगी? बोले, मैं विप्र हूँ, रूपय-पैसे का दान तो रोज ही पाता हूँ, आज रूप का दान दे दो।
मैंने यों ही उसका मन परखने को कह दिया, मैं