मेहता ने एक झटके से हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़े।
मालती सजल नेत्र हो कर बोली - मैं कहती हूँ, मत जाओ। नहीं मैं इसी चट्टान पर सिर पटक दूँगी।
मेहता ने तेजी से कदम बढ़ाए। मालती उन्हें देखती रही। जब वह बीस कदम निकल गए, तो झुँझला कर उठी और उनके पीछे दौड़ी। अकेले विश्राम करने में कोई आनंद न था।
समीप आ कर बोली- मैं तुम्हें इतना पशु न जानती थी।
'मैं जो हिरन मारूँगा, उसकी खाल तुम्हें भेंट करूँगा।'
'खाल जाय भाड़ में। मैं अब तुमसे बात न करूँगी।
'कहीं हम लोगों के हाथ कुछ न लगा और दूसरों ने अच्छे शिकार मारे तो मुझे बड़ी झेंप होगी।'
एक चौड़ा नाला मुँह फैलाए बीच में खड़ा था। बीच की चट्टानें उसके दाँतों-सी लगती थीं। धार में इतना वेग था कि लहरें उछली पड़ती थीं। सूर्य मध्याह्न आ पहुँचा था और उसकी प्यासी किरणें जल में क्रीड़ा कर रही थीं।
जीता न छोड़ेंगी। मुझे भी उस पर दया आ गई। गोबर को उसकी दया बुरी लगी - यह तुमने क्या किया? उसकी औरत से जा कर कह क्यों नहीं दिया? जूती से पीटती। ऐसे पाखंडियों पर दया न करनी चाहिए। तुम मुझे कल उसकी सूरत दिखा दो, फिर देखना, कैसी मरम्मत करता हूँ।
झुनिया ने उसके अर्द्ध-विकसित यौवन को देख कर कहा - तुम उसे न पाओगे। खास देव है। मुफ्त का माल उड़ाता है कि नहीं।
गोबर अपने यौवन का यह तिरस्कार कैसे सहता? डींग मार कर बोला - मोटे