मालती ने प्रसन्न हो कर कहा - अब तो लौटना पड़ा।

'क्यों उस पार चलेंगे। यहीं तो शिकार मिलेंगे।'

'धारा में कितना वेग है। मैं तो बह जाऊँगी।'

'अच्छी बात है। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।'

'हाँ, आप जाइए। मुझे अपने जान से बैर नहीं है।'

मेहता ने पानी में कदम रखा और पाँव साधते हुए चले। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे, पानी गहरा होता जाता था। यहाँ तक कि छाती तक आ गया।

मालती अधीर हो उठी। शंका से मन चंचल हो उठा। ऐसी विकलता तो उसे कभी न होती थी। ऊँचे स्वर में बोली - पानी गहरा है। ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।

'नहीं-नहीं, तुम फिसल जाओगी। धार तेज है।'

'कोई हरज नहीं, मैं आ रही हूँ। आगे न बढ़ना, खबरदार।'

मालती साड़ी ऊपर चढ़ा कर नाले में पैठी। मगर दस हाथ आते-आते पानी उसकी कमर तक आ गया।

मेहता घबड़ाए। दोनों


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होने से क्या होता है। यहाँ फौलाद की हड्डियाँ हैं। तीन सौ डंड रोज मारता हूँ। दूध-घी नहीं मिलता, नहीं अब तक सीना यों निकल आया होता।

यह कह कर उसने छाती फैला कर दिखाई।

झुनिया ने आश्वस्त आँखों से देखा - अच्छा, कभी दिखा दूँगी लेकिन वहाँ तो सभी एक-से हैं, तुम किस-किसकी मरम्मत करोगे? न जाने मरदों की क्या आदत है कि जहाँ कोई जवान, सुंदर औरत देखी और बस लगे घूरने, छाती पीटने। और यह जो बड़े आदमी कहलाते हैं, ये तो निरे लंपट होते हैं। फिर मैं तो कोई सुंदरी नहीं हूँ...


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