मेहता ने पूछा - तुम बहुत डर रही थीं?
'पहले तो डरी, लेकिन फिर मुझे विश्वास हो गया कि तुम हम दोनों की रक्षा कर सकते हो।'
मेहता ने गर्व से मालती को देखा - उनके मुख पर परिश्रम की लाली के साथ तेज था।
'मुझे यह सुन कर कितना आनंद आ रहा है, तुम यह समझ सकोगी मालती?'
'तुमने समझाया कब? उलटे और जंगलों में घसीटते फिरते हो, और अभी फिर लौटती बार यही नाला पार करना पड़ेगा। तुमने कैसी आफत में जान डाल दी। मुझे तुम्हारे साथ रहना पड़े, तो एक दिन न पटे।'
मेहता मुस्कराए। इन शब्दों का संकेत खूब समझ रहे थे।
'तुम मुझे इतना दुष्ट समझती हो! और जो मैं कहूँ कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, तो तुम मुझसे विवाह करोगी?'
'ऐसे काठ-कठोर से कौन विवाह करेगा। रात-दिन जला कर मार डालोगे।'
और मधुर नेत्रों से देखा, मानो कह रही हो - इसका आशय तुम खूब समझते हो। इतने बुद्धू नहीं हो।
कुछ मजाल नहीं है। हम अपने मन की रानी हैं, जो हमारी इच्छा होगी,वह हम करेंगे। बेचारा बाप जवान-जवान लड़कियों से क्या बोले? मारने-बाँधने से रहा, डाँटने-डपटने से रहा, लेकिन भाई, बड़े आदमियों की बातें कौन चलावे। वह जो कुछ करें, सब ठीक है। उन्हें तो बिरादरी और पंचायत का भी डर नहीं। मेरी समझ में तो यही नहीं आता कि किसी का रोज-रोज मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया-बीता हो गया? लेकिन किसी को बुरा नहीं कहती भाई! मन को जैसा बनाओ,