'तेंदुआ मारना चाहो, तो मैं उसका ठौर दिखा दूँ। रात को यहाँ रोज पानी पीने आता है। कभी-कभी दोपहर में भी आ जाता है।'

फिर जरा सकुचा कर सिर झुकाए बोली - उसकी खाल हमें देनी पड़ेगी। चलो, मेरे द्वार पर। वहाँ पीपल की छाया है। यहाँ धूप में कब तक खड़े रहोगे? कपड़े भी तो गीले हो गए हैं।

मेहता ने उसकी देह में चिपकी हुई गीली साड़ी की ओर देख कर कहा - तुम्हारे कपड़े भी तो गीले हैं।

उसने लापरवाही से कहा - ऊँह हमारा क्या, हम तो जंगल के हैं। दिन-दिन भर धूप और पानी में खड़े रहते हैं, तुम थोड़े ही रह सकते हो।

लड़की कितनी समझदार है और बिलकुल गँवार।

'तुम खाल ले कर क्या करोगी?'

'हमारे दादा बाजार में बेचते हैं। यही तो हमारा काम है।'

'लेकिन दोपहरी यहाँ काटें, तुम खिलाओगी क्या?'

युवती ने लजाते हुए कहा - तुम्हारे खाने लायक


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यह कह कर वह लौट पड़ी।

गोबर ने आग्रह करके कहा - एक छन के लिए मेरे घर क्यों नहीं चली चलती? अम्माँ भी तो देख लें।

झुनिया ने लज्जा से आँखें चुरा कर कहा - तुम्हारे घर यों न जाऊँगी। मुझे तो यही अचरज होता है कि मैं इतनी दूर कैसे आ गई। अच्छा बताओ, अब कब आओगे? रात को मेरे द्वार पर अच्छी संगत होगी। चले आना, मैं अपने पिछवाड़े मिलूँगी।

'और जो न मिली?'

'तो लौट जाना।'

'तो फिर मैं न आऊँगा।'

'आना पड़ेगा, नहीं कहे देती हूँ।'


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