हमारे घर में क्या है। मक्के की रोटियाँ खाओ, तो धरी हैं। चिड़िए का सालन पका दूँगी। तुम बताते जाना, जैसे बनाना हो। थोड़ा-सा दूध भी है। हमारी गैया को एक बार तेंदुए ने घेरा था। उसे सींगों से भगा कर भाग आई, तब से तेंदुआ उससे डरता है।
'लेकिन मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे साथ एक औरत भी है।'
'तुम्हारी घरवाली होगी?'
'नहीं, घरवाली तो अभी नहीं है, जान-पहचान की है।'
'तो मैं दौड़ कर उनको बुला लाती हूँ। तुम चल कर छाँह में बैठो।'
'नहीं-नहीं, मैं बुला लाता हूँ।'
तुम थक गए होगे। शहर के रहैया, जंगल में काहे आते होंगे। हम तो जंगली आदमी हैं। किनारे ही तो खड़ी होंगी।'
जब तक मेहता कुछ बोलें, वह हवा हो गई। मेहता ऊपर चढ़ कर पीपल की छाँह में बैठे, तो इस स्वच्छंद जीवन से उनके मन में अनुराग उत्पन्न हुआ। सामने की पर्वत-माला दर्शन-तत्व
'तुम भी बचन दो कि मिलोगी?'
'मैं बचन नहीं देती।'
'तो मैं भी नहीं आता।'
'मेरी बला से!'
झुनिया अँगूठा दिखा कर चल दी। प्रथम-मिलन में ही दोनों एक-दूसरे पर अपना-अपना अधिकार जमा चुके थे। झुनिया जानती थी, वह आएगा, कैसे न आएगा? गोबर जानता था, वह मिलेगी, कैसे न मिलेगी?
जब वह अकेला गाय को हाँकता हुआ चला, तो ऐसा लगता था, मानो स्वर्ग से गिर पड़ा है।
भाग 6
जेठ की उदास और गर्म संध्या सेमरी की सड़कों और गलियों में,