'जमींदार की बात और है।'
'हाँ, वह डंडे के जोर से काम लेता है न।'
'उसके खेत नहीं जोतते?'
'खेत जोतते हैं, तो लगान नहीं देते?'
'अच्छा भाई, जान न खा, हम दोनों चले जाएँगे। कहाँ-से-कहाँ मैंने इन्हें भूसा देने को कह दिया। या तो चलेगी नहीं, या चलेगी तो दौड़ने लगेगी।'
तीनों खाँचे भूसे से भर दिए गए। गोबर कुढ़ रहा था। उसे अपने बाप के व्यवहारों में जरा भी विश्वास न था। वह समझता था, यह जहाँ जाते हैं, वहीं कुछ-न-कुछ घर से खो आते हैं। धनिया प्रसन्न थी। रहा होरी, वह धर्म और स्वार्थ के बीच में डूब-उतरा रहा था।
होरी और गोबर मिल कर एक खाँचा बाहर लाए। भोला ने तुरंत अपने-अंगौछे का बींड़ बना कर सिर पर रखते हुए कहा - मैं इसे रख कर अभी भागा आता हूँ। एक खाँचा और लूँगा।
होरी बोला - एक नहीं, अभी दो और भरे धरे हैं।
दौरे पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ। उनकी भौंहों पर शिकन पड़ी और हमारे प्राण सूखे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते; मगर वह पचड़ा सुनाने लगूँ तो शायद तुम्हें विश्वास न आए। डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत है, हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं। मुफ्तखोरी ने हमें अपंग बना दिया है, हमें अपने पुरुषार्थ पर लेश मात्र भी विश्वास नहीं, केवल अफसरों के सामने दुम हिला-हिला कर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता