फिर होरी से बोला - घरनी के बिना घर नहीं रहता भैया। पुरानी कहावत है - 'नाटन खेती बहुरियन घर'। नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएँ क्या घर सँभालेंगी। जब से इनकी माँ मरी है, जैसे घर की बरक्कत ही उठ गई। बहुएँ आटा पाथ लेती हैं; पर गृहस्थी चलाना क्या जानें। हाँ, मुँह चलाना खूब जानती हैं। लौंडे कहीं फड़ पर जमे होंगे। सब-के-सब आलसी हैं, कामचोर। जब तक जीता हूँ, इनके पीछे मरता हूँ। मर जाऊँगा, तो आप सिर पर हाथ धर कर रोएँगे। लड़की भी वैसी ही। छोटा-सा अढ़ौना भी करेगी, तो भुन-भुना कर। मैं तो सह लेता हूँ, खसम थोड़े ही सहेगा।
झुनिया एक हाथ में भरी हुई चिलम, दूसरे में रस का लोटा लिए बड़ी फुर्ती से आ पहुँची। फिर रस्सी और कलसा ले कर पानी भरने चली। गोबर ने उसके हाथ से कलसा लेने के लिए हाथ बढ़ा कर झेंपते हुए कहा - तुम रहने दो, मैं भरे लाता हूँ।
जायँ, तो रहें कहाँ? भगवान ने जब गुलाम बना दिया है, तो अपना क्या बस है? यह इसी सलामी की बरकत है, कि द्वार पर मँड़ैया डाल ली और किसी ने कुछ नहीं कहा । घूरे ने द्वार पर खूँटा गाड़ा था, जिस पर कारिंदों ने दो रुपए डाँड़ ले लिए थे। तलैया से कितनी मिट्टी हमने खोदी, कारिंदा ने कुछ नहीं कहा। दूसरा खोदे तो नजर देनी पड़े। अपने मतलब के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है। घंटों खड़े रहो, तब जा