था। वह निश्चिंत थी। अब उस द्वार पर कोई रक्षक न था, इसलिए वह उस द्वार को सदैव बंद रखती है। कभी-कभी घर के सूनेपन से उकता कर वह द्वार खोलती है; पर किसी को आते देख कर भयभीत हो कर दोनों पट भेड़ लेती है।
गोबर ने कलसा भर कर निकाला। सबों ने रस पिया और एक चिलम तमाखू और पी कर लौटे। भोला ने कहा - कल तुम आ कर गाय ले जाना गोबर, इस बखत तो सानी खा रही है।
गोबर की आँखें उसी गाय पर लगी हुई थीं और मन-ही-मन वह मुग्ध हुआ जाता था। गाय इतनी सुंदर और सुडौल है, इसकी उसने कल्पना भी न की थी।
होरी ने लोभ को रोक कर कहा - मँगवा लूँगा, जल्दी क्या है?
'तुम्हें जल्दी न हो, हमें तो जल्दी है। उसे द्वार पर देख कर तुम्हें वह बात याद रहेगी।'
'उसकी मुझे बड़ी फिकर है दादा!'
'तो कल गोबर को भेज देना।'
कर गोबर कुछ शांत हो गया और चुपचाप चलने लगा। सोना ने देखा, रूपा बाप की गोद में चढ़ी बैठी है तो ईर्ष्या हुई। उसे डाँट कर बोली - अब गोद से उतर कर पाँव-पाँव क्यों नहीं चलती, क्या पाँव टूट गए हैं?
रूपा ने बाप की गर्दन में हाथ डाल कर ढिठाई से कहा - न उतरेंगे जाओ। काका, बहन हमको रोज चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मैं सोना हूँ। मेरा नाम कुछ और रख दो।
होरी ने सोना को बनावटी रोष से देख कर कहा - तू इसे क्यों चिढ़ाती है सोनिया, सोना तो देखने को है। निबाह तो रूपा से होता है। रूपा न हो, तो रुपए कहाँ से बनें, बता?