दगा करना नीचता है। अस्सी रुपए की गाय मेरे विश्वास पर दे दी, नहीं यहाँ तो कोई एक पैसे को नहीं पतियाता। सन में क्या कुछ न मिलेगा? अगर पच्चीस रुपए भी दे दूँ, तो भोला को ढाढ़स हो जाए। धनिया से नाहक बता दिया। चुपके से गाय ला कर बाँध देता तो चकरा जाती। लगती पूछने, किसकी गाय है? कहाँ से लाए हो? खूब दिक करके तब बताता, लेकिन जब पेट में बात पचे भी। कभी दो-चार पैसे ऊपर से आ जाते है, उनको भी तो नहीं छिपा सकता। और यह अच्छा भी है। उसे घर की चिंता रहती है; अगर उसे मालूम हो जाय कि इनके पास भी पैसे रहते हैं, तो फिर नखड़े बघारने लगे। गोबर जरा आलसी है, नहीं मैं गऊ की ऐसी सेवा करता कि जैसी चाहिए। आलसी-वालसी कुछ नहीं है। इस उमिर में कौन आलसी नहीं होता? मैं भी दादा के सामने मटरगस्ती ही किया करता था। बेचारे पहर रात से कुट्टी


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बाप की गोद में रह न सकी। जमीन पर कूद पड़ी और उछल-उछल कर यही रट लगाने लगी - रूपा राजा, सोना चमार - रूपा राजा, सोना चमार!

ए लोग घर पहुँचे तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी। रुष्ट हो कर बोली - आज इतनी देर क्यों की गोबर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही दे देता है।

फिर पति से गर्म हो कर कहा - तुम भी वहाँ से कमाई करके लौटे तो खेत में पहुँच गए। खेत कहीं भागा जाता था!

द्वार पर कुआँ था। होरी और गोबर ने एक-एक


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