मोल बाँस का नहीं है, सहर के नगीच होने का है। आदमी सोचता है, जितनी देर वहाँ जाने में लगेगी, उतनी देर में तो दो-चार रुपए का काम हो जायगा।'

सौदा पट गया। चौधरी ने मिर्जई उतार कर छान पर रख दी और बाँस काटने लगा।

ऊख की सिंचाई हो रही थी। हीरा-बहू कलेवा ले कर कुएँ पर जा रही थी। चौधरी को बाँस काटते देख कर घूँघट के अंदर से बोली - कौन बाँस काटता है? यहाँ बाँस न कटेंगे।

चौधरी ने हाथ रोक कर कहा - बाँस मोल लिए हैं, पंद्रह रुपए सैकड़े का बयाना हुआ है। सेंत में नहीं काट रहे हैं।

हीरा-बहू अपने घर की मालकिन थी। उसी के विद्रोह से भाइयों में अलगौझा हुआ था। धनिया को परास्त करके शेर हो गई थी। हीरा कभी-कभी उसे पीटता था। अभी हाल में इतना मारा था कि वह कई दिन तक खाट से न उठ सकी, लेकिन अपना पदाधिकार वह किसी तरह


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तो होरी ने कहा - जरा ठहर जाओ बेटा, हम भी चलते हैं। तब तक थोड़ा-सा भूसा निकाल कर रख दो। मैंने भोला को देने को कहा है। बेचारा आजकल बहुत तंग है।

गोबर ने अवज्ञा-भरी आँखों से देख कर कहा - हमारे पास बेचने को भूसा नहीं है।

'बेचता नहीं हूँ भाई, यों ही दे रहा हूँ। वह संकट में है, उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी।'

'हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी।'

'दे तो रहा था, पर हमने ली ही नहीं।'

'धनिया मटक कर बोली - गाय नहीं


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