न छोड़ती थी। हीरा क्रोध में उसे मारता था, लेकिन चलता था उसी के इशारों पर, उस घोड़े की भाँति, जो कभी-कभी स्वामी को लात मार कर भी उसी के आसन के नीचे चलता है।

कलेवे की टोकरी सिर से उतार कर बोली - पंद्रह रुपए में हमारे बाँस न जाएँगे।

चौधरी औरत जात से इस विषय में बातचीत करना नीति-विरुद्ध समझते थे। बोले - जा कर अपने आदमी को भेज दो। जो कुछ कहना हो, आ कर कहें।

हीरा-बहू का नाम था पुन्नी। बच्चे दो ही हुए थे। लेकिन ढल गई थी। बनाव-सिंगार से समय के आघात का शमन करना चाहती थी, लेकिन गृहस्थी में भोजन ही का ठिकाना न था, सिंगार के लिए पैसे कहाँ से आते? इस अभाव और विवशता ने उसकी प्रकृति का जल सुखा कर कठोर और शुष्क बना दिया था, जिस पर एक बार गावड़ा भी उचट जाता था।

समीप आ कर चौधरी का हाथ पकड़ने की चेष्टा करती


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वह दे रहा था। इन्हें गाय दे देगा! आँख में अंजन लगाने को कभी चिल्लू-भर दूध तो भेजा नहीं, गाय दे देगा!

होरी ने कसम खाई - नहीं, जवानी कसम, अपने पछाई गाय दे रहे थे। हाथ तंग है, भूसा-चारा नहीं रख सके। अब एक गाय बेच कर भूसा लेना चाहते हैं। मैंने सोचा, संकट में पड़े आदमी की गाय क्या लूँ। थोड़ा-सा भूसा दिए देता हूँ, कुछ रुपए हाथ आ जाएँगे तो गाय ले लूँगा। थोड़ा-थोड़ा करके चुका दूँगा। अस्सी रुपए की है, मगर ऐसी कि आदमी देखता रहे।

गोबर ने


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