हुई बोली - आदमी को क्यों भेज दूँ? जो कुछ कहना हो, मुझसे कहो न? मैंने कह दिया, मेरे बाँस न कटेंगे।
चौधरी हाथ छुड़ाता था और पुन्नी बार-बार पकड़ लेती थी। एक मिनट तक यही हाथा-पाई होती रही। अंत में चौधरी ने उसे जोर से पीछे ढकेल दिया। पुन्नी धक्का खा कर गिर पड़ी, मगर फिर संभली और पाँव से तल्ली निकाल कर चौधरी के सिर, मुँह, पीठ पर अंधाधुंध जमाने लगी। बँसोर हो कर उसे ढकेल दे? उसका यह अपमान! मारती जाती थी और रोती भी जाती थी। चौधरी उसे धक्का दे कर नारी जाति पर बल का प्रयोग करके गच्चा खा चुका था। खड़े-खड़े मार खाने के सिवा इस संकट से बचने की उसके पास और कोई दवा न थी।
पुन्नी का रोना सुन कर होरी भी दौड़ा हुआ आया। पुन्नी ने उसे देख कर और जोर से चिल्लाना शुरू किया। होरी ने समझा, चौधरी ने पुनिया को मारा है। खून ने जोश मारा और
आड़े हाथों लिया - तुम्हारा यही धरमात्मापन तो तुम्हारी दुरगत कर रहा है। साफ-साफ तो बात है। अस्सी रुपए की गाय है, हमसे बीस रुपए का भूसा ले लें और गाय हमें दे दें। साठ रुपए रह जाएँगे, वह हम धीरे-धीरे दे देंगे।
होरी रहस्यमय ढंग से मुस्कराया - मैंने ऐसी चाल सोची है कि गाय सेंत-मेंत में हाथ आ जाए। कहीं भोला की सगाई ठीक करनी है, बस! दो-चार मन भूसा तो खाली अपना रंग जमाने को देता हूँ।
गोबर ने तिरस्कार किया - तो तुम अब सबकी सगाई ठीक करते फिरोगे?