अलगौझे की ऊँची बाधा को तोड़ता हुआ, सब कुछ अपने अंदर समेटने के लिए बाहर निकल पड़ा। चौधरी को जोर से एक लात जमा कर बोला - अब अपना भला चाहते हो चौधरी, तो यहाँ से चले जाओ, नहीं तुम्हारी लहास उठेगी। तुमने अपने को समझा क्या है? तुम्हारी इतनी मजाल कि मेरी बहू पर हाथ उठाओ।
चौधरी कसमें खा-खा कर अपने सफाई देने लगा। तल्लियों की चोट में उसकी अपराधी आत्मा मौन थी। यह लात उसे निरपराध मिली और उसके फुले हुए गाल आँसुओं से भीग गए। उसने तो बहू को छुआ भी नहीं। क्या वह इतना गँवार है कि महतो के घर की औरतों पर हाथ उठाएगा?
होरी ने अविश्वास करके कहा - आँखों में धूल मत झोंको चौधरी, तुमने कुछ कहा नहीं, तो बहू झूठ-मूठ रोती है? रुपए की गरमी है, तो वह निकाल दी जायगी, अलग हैं तो क्या हुआ, है तो एक खून। कोई तिरछी आँख से देखे तो आँख निकाल लें।
धनिया ने तीखी आँखों से देखा - अब यही एक उद्यम तो रह गया है। नहीं देना है हमें भूसा किसी को। यहाँ भोला-भोली किसी का करज नहीं खाया है।
होरी ने अपने सफाई दी - अगर मेरे जतन से किसी का घर बस जाय तो इसमें कौन-सी बुराई है?
गोबर ने चिलम उठाई और आग लेने चला गया। उसे यह झमेला बिलकुल नहीं भाता था।
धनिया ने सिर हिला कर कहा - जो उनका घर बसाएगा, वह अस्सी रुपए की गाय ले कर चुप न होगा। एक थैली गिनवाएगा।
होरी ने पुचारा