कर बोली - लगा दे घर में आग, मुझे क्या करना है! भाग फूट गया कि तुझ जैसे कसाई के पाले पड़ी। लगा दे घर में आग।
उसने कलेऊ की टोकरी वहीं छोड़ दी और घर की ओर चली। हीरा गरजा - वहाँ कहाँ जाती है, चल कुएँ पर, नहीं खून पी जाऊँगा।
पुनिया के पाँव रूक गए। इस नाटक का दूसरा अंक न खेलना चाहती थी। चुपके से टोकरी उठा कर रोती हुई कुएँ की ओर चली। हीरा भी पीछे-पीछे चला।
होरी ने कहा - अब फिर मार-धाड़ न करना। इससे औरत बेसरम हो जाती है।
धनिया ने द्वार पर आ कर हाँक लगाई - तुम वहाँ खड़े-खड़े क्या तमासा देख रहे हो? कोई तुम्हारी सुनता भी है कि यों ही सिच्छा दे रहे हो। उस दिन इसी बहू ने तुम्हें घूँघट की आड़ में डाढ़ीजार कहा था, भूल गए। बहुरिया हो कर पराए मरदों से लड़ेगी, तो डाँटी न जायगी।
होरी द्वार पर आ कर नटखटपन के साथ बोला - और जो मैं इसी तरह तुझे मारूँ?
धनिया बिगड़ी - पाहुने और कैसे होते हैं। रोज-रोज तो तुम्हारे द्वार पर नहीं आते हैं? इतनी दूर से धूप-घाम में आए हैं, प्यास लगी ही होगी। रुपिया, देख डब्बे में तमाखू है कि नहीं, गोबर के मारे काहे को बची होगी। दौड़ कर एक पैसे की तमाखू सहुआइन की दुकान से ले ले।
भोला की आज जितनी खातिर हुई, और कभी न हुई होगी। गोबर ने खाट डाल दी, सोना रस घोल लाई, रूपा तमाखू भर लाई। धनिया द्वार पर किवाड़ की आड़ में खड़ी अपने कानों से अपना बखान सुनने के लिए अधीर हो रही थी।