का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर बगुले उठते हैं और पृथ्वी काँपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी होती है। उसके बाद विश्राममय संध्या आती है, शीतल और शांत, जब हम थके हुए पथिकों की भाँति दिन-भर की यात्रा का वृत्तांत करते और सुनते हैं तटस्थ भाव से, मानो हम किसी ऊँचे शिखर पर जा बैठे हैं, जहाँ नीचे का जन-रव हम तक नहीं पहुँचता।
धनिया ने आँखों में रस भर कर कहा - चलो-चलो, बड़े बखान करने वाले! जरा-सा कोई काम बिगड़ जाय, तो गरदन पर सवार हो जाते हो।
होरी ने मीठे उलाहने के साथ कहा - ले, अब यही तेरी बेइंसाफी मुझे अच्छी नहीं लगती धनिया! भोला से पूछ, मैंने उनसे तेरे बारे में क्या कहा था?
धनिया ने बात बदल कर कहा - देखो, गोबर गाय ले कर आता है कि खाली हाथ।
चौधरी
होगा। मन-भर से कम में न भरेगा। दो खाँचे भी दिए, तो दो मन निकल जाएँगे।
धनिया फूली हुई थी। मलामत की आँखों से देखती हुई बोली - या तो किसी को नेवता न दो, और दो तो भरपेट खिलाओ। तुम्हारे पास फूल-पत्र लेने थोड़े ही आए हैं कि चँगेरी ले कर चलते। देते ही हो, तो तीन खाँचे दे दो। भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया? अकेले कहाँ तक ढोएगा? जान निकल जायगी।
'तीन खाँचे तो मेरे दिए न दिए जाएँगे।'
'तब क्या एक खाँचा दे कर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खाँचा भर कर उनके साथ चला जाए।'