ने पसीने में लथपथ आ कर कहा - महतो, चल कर बाँस गिन लो। कल ठेला ला कर उठा ले जाऊँगा।
होरी ने बाँस गिनने की जरूरत न समझी। चौधरी ऐसा आदमी नहीं है। फिर एकाध बाँस बेसी काट ही लेगा, तो क्या। रोज ही तो मँगनी बाँस कटते रहते हैं। सहालगों में तो मंडप बनाने के लिए लोग दर्जनों बाँस काट ले जाते हैं।
चौधरी ने साढ़े सात रुपए निकाल कर उसके हाथ में रख दिए। होरी ने गिनकर कहा - और निकालो। हिसाब से ढाई और होते हैं।
चौधरी ने बेमुरौवती से कहा - पंद्रह रुपए में तय हुए हैं कि नहीं?
'पंद्रह रुपए में नहीं, बीस रुपए में।'
'हीरा महतो ने तुम्हारे सामने पंद्रह रुपए कहे थे। कहो तो बुला लाऊँ?'
'तय तो बीस रुपए में ही हुए थे चौधरी ! अब तुम्हारी जीत है, जो चाहो कहो। ढाई रुपए निकलते हैं, तुम दो ही दे दो।'
मगर चौधरी कच्ची गोलियाँ
'गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है।'
'एक दिन न गोड़ने से ऊख सूख न जायगी।'
'यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते। भगवान के दिए दो-दो बेटे हैं।'
'न होंगे घर पर। दूध ले कर बाजार गए होंगे।'
'यह तो अच्छी दिल्लगी है कि अपना माल भी दो और उसे घर तक पहुँचा भी दो। लाद दे, लदा दे, लादने वाला साथ कर दे।'
'अच्छा भाई, कोई मत जाए। मैं पहुँचा दूँगी। बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है।'
'और तीन खाँचे उन्हें दे दूँ, तो अपने बैल क्या खाएँगे?'