न खेला था। अब उसे किसका डर? होरी के मुँह में तो ताला पड़ा हुआ था। क्या कहे, माथा ठोंक कर रह गया। बस इतना बोला - यह अच्छी बात नहीं है, चौधरी, दो रुपए दबा कर राजा न हो जाओगे।

चौधरी तीक्ष्ण स्वर में बोला - और तुम क्या भाइयों के थोड़े-से पैसे दबा कर राजा हो जाओगे? ढाई रुपए पर अपना ईमान बिगाड़ रहे थे, उस पर मुझे उपदेस देते हो। अभी परदा खोल दूँ, तो सिर नीचा हो जाए।

होरी पर जैसे सैकड़ों जूते पड़ गए। चौधरी तो रुपए सामने जमीन पर रख कर चला गया, पर वह नीम के नीचे बैठा बड़ी देर तक पछताता रहा। वह कितना लोभी और स्वार्थी है, इसका उसे आज पता चला। चौधरी ने ढाई रुपए दे दिए होते, तो वह खुशी से कितना फूल उठता। अपने चालाकी को सराहता कि बैठे-बैठाए ढाई रुपए मिल गए। ठोकर खा कर ही तो हम सावधानी के साथ पग उठाते हैं।


88 of 1052



'यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था। न हो, तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ।'

'मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, अपना घर उठा कर नहीं दे दिया जाता!'

'अभी जमींदार का प्यादा आ जाय, तो अपने सिर पर भूसा लाद कर पहुँचाओगे तुम, तुम्हारा लड़का, लड़की सब। और वहाँ साइत मन-दो-मन लकड़ी भी गाड़नी पड़े।'

'जमींदार की बात और है।'

'हाँ, वह डंडे के जोर से काम लेता है न।'

'उसके खेत नहीं जोतते?'

'खेत जोतते हैं, तो लगान नहीं देते?'


88 of 1737